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वसीम जाफर ने कहा, मौलवी मैंने नहीं, इकबाल ने बुलाए थे, मौलवियों के कारण टूटा बायो-बबल

नई दिल्ली। पूर्व भारतीय किक्रेटर वसीम जाफर (Wasim Jaffer) ने अपने ऊपर लगे इस्लाम को बढ़ावा देने के आरोपों को मुंबई में एक प्रेस-कॉन्फ्रेंस में सिरे से नकार दिया है। लेकिन उन्होंने एक बात जरूर कबूल है कि सीनियर टीम के कैंप के दौरान जुम्मे की नमाज अदा करने के लिए मौलवी आए थे। इन मौलवियों (Clerics) को कप्तान अब्दुल्ला (Iqbal Abdullah) ने बुलाया था, मैंने नहीं बुलाया। दरअसल, उत्तराखंड क्रिकेट संघ ‘सीएयू‘ ने सैयद मुश्ताक अली ट्रॉफी के दौरान लगाए गए सीनियर कैंप में मौलवियों द्वारा कोच वसीम जाफर और कप्तान इकबाल अब्दुल्ला सहित कुछ अन्य खिलाड़ियों को नमाज अदा करने की वजह से बायो-बबल (Bio bubble) टूटने की जांच कराने का फैसला किया है।

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सीएयू के सचिव और बीसीसीआई के पूर्व उपाध्यक्ष महिम वर्मा ने कहा कि मैंने जनरल मैनेजर मोहित डोभाल से कहा था कि वह उस समय टीम के मैनेजर रहे नवनीत मिश्रा से इस मामले में रिपोर्ट मांगे। वहीं पूर्व मुख्य कोच व पूर्व भारतीय क्रिकेटर वसीम जाफर ने अपने ऊपर लगे मजहबी आरोपों को मुंबई में प्रेस कांफ्रेंस करके नकारा है। हालांकि उन्होंने इस बात का कबूल किया है कि कैंप के दौरान जुम्मे की नमाज अदा कराने के लिए मौलवी आए थे।

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अब्दुला ने बुलाया मौलियों को
कप्तान इकबाल अब्दुल्ला ने मौलवियों को बुलाया था। अब्दुला मुझसे पूछने आए तो मैंने कहा कि मैनेजर से बात कर लो। मैनेजर की अनुमति के बाद नमाज अदा की थी। उन्होंने बायो-बबल तोड़ने से इनकार किया।

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मुझे पता होता तो एक्शन लेता
महिम ने कहा कि सीएयू ने जितने भी कैंप लगाए हैं। यहां तक कि महिलाओं के कैंप में भी बायो-बबल लगाया गया था। खिलाड़ियों को कोरोना से बचाने के लिए बायो-बबल जरूरी था। इसके लिए हमने काफी धन खर्च किया। निश्चित तौर पर खिलाड़ियों के अलावा अगर कोई भी बाहरी कैंप में जाता है और उनसे मिलता है तो बायो-बबल टूटता है। इससे बाकी खिलाड़ियों को भी कोरोना होने का खतरा बढ़ जाता है। मुझे इस बारे में तब नहीं पता चला वर्ना मैं तब ही एक्शन लेता।

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मेरे ऊपर लगे सभी आरोप गलत
वसीम ने मुंबई में एक प्रेस कॉन्फ्रेस में कहा कि सीएयू ने जो आरोप लगाए हैं वह गलत और बहुत ही दुख पहुंचाने वाले हैं। मेरे पर आरोप लगाए जा रहे हैं कि मैं इकबाल को कप्तान बनाना चाहता था। यह पूरी तरह गलत है। उन्होंने कहा कि मौलवी बायो-बबल में आए और हमने नमाज अदा की। मैं चीज बताना चाहता हूं कि देहरादून में दो-तीन मौलवी और मौलाना आए थे और मैंने उन्हें कॉल नहीं किया था। इकबाल ने ही मैनेजर से नमाज अदा करने की अनुमति मांगी थी। टीम के प्रशिक्षण के बाद प्रार्थनाएं हुई और मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि यह मुद्दा क्यों बन गया। यदि मैं सांप्रदायिक होता तो अपनी प्रार्थना के समय दौरान अभ्यास के समय को दूसरा कर सकता था, लेकिन मैंने ऐसा नहीं किया।



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