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Haridwar Kumbh mela 2021- आखिर कुम्भ मेला क्यों लगता है जानिए इसका इतिहास

कुंभ पर्व सनातन हिंदू धर्म का एक महत्वपूर्ण पर्व है, जिसमें करोड़ों श्रद्धालु कुंभ पर्व स्थल प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक में स्नान करते हैं। ऐसे में इस बार कुंभ मेला हरिद्वार 2021 (haridwar Kumbh mela 2021) में लग रहा है। कुंभ / महाकुम्भ मेला हर बारह वर्ष बाद लगता है जबकि अर्ध कुंभ मेला हा छः साल बाद लगता है।

पूरे भारवर्ष में कुल चार जगहों पर कुंभ मेले का आयोजन होता है और हरिद्वार भी उनमें से एक जगह है जो कि गंगा नदी के तट पर स्थित है। लेकिन, इस बार हरिद्वार में कुंभ मेला 11वें वर्ष में ही 2021 में लग रहा है। इसका कारण यह है क्योंकि ग्रह गोचर के अनुसार बृहस्पति अगले साल कुंभ राशि में प्रवेश नहीं करेंगे, इस कारण इस वर्ष ही कुंभ का आयोजन हो रहा है।

कुंभ के आयोजन पर बृहस्पति कुंभ राशि में प्रवेश करते हैं जबकि सूर्य मेष राशि में रहते हैं।

हरिद्वार उत्तराखंड का एक मुख्य पर्यटक स्थल भी है। ऐसे में आज हम आपको कुंभ का मेला कहां लगता है? (kumbh mela kaha lagta hai) और कुम्भ मेला कितने साल बाद लगता है इसके अलावा कुंभ मेला 2021 में कब है और कुंभ मेला क्यों लगता है? इस बारे में बता रहे हैं।

हरिद्वार कुंभ मेला 2021 (Haridwar kumbh mela 2021)
उत्तराखंड की मायानगरी कहे जाने वाले हरिद्वार नगर में इस वर्ष यानी 2021 में कुंभ मेला लग रहा है। जैसा कि माना जा रहा है कि कोरोना महामारी के कारण इस बार हरिद्वार कुंभ मेले पर काफी असर पड़ेगा, लेकिन फिर भी कुंभ की तैयारियां जोरों पर हैं।

कुंभ मेला क्यों लगता है ? आइये जानें
जानकारों के अनुसार दरअसल कुंभ का अर्थ है कलश। वहीं बारह राशियों में से एक राशि कुंभ भी है जिसका प्रतीक भी कलश ही है। जबकि कुंभ मेले का इतिहास समुद्र मंथन से जुड़ा हुआ है। मन जाता है कि एक बार महर्षि दुर्वासा स्वर्ग लोक आए और इन्द्र देव से मिले, यहां उन्होंने इन्द्र देव को एक दिव्य माला उपहार स्वरूप दी। लेकिन इन्द्र उस समय उस दिव्य माला का महत्व नहीं समझ पाए और उन्होंने महर्षि दुर्वासा की दी हुई माला उन्होंने अपने एरावत हाथी को पहना दी और हंसने लगे।

इन्द्र के इस व्यवहार से दुर्वासा ऋषि को क्रोध आ गया और उन्होंने देवताओं को श्राप दे दिया, इस श्राप के प्रभाव से देवता कमजोर पड़ने लग गए और शत्रु असुरों /दैत्यों की शक्ति बढ़ने लगी। जिसके चलते असुरों ने देवताओं को हरा दिया।

ऐसी स्थिति में देवता भगवान विष्णु से जाकर मिले। भगवान विष्णु ने देवताओं को दैत्यों के साथ मिलकर क्षीरसागर में समुद्र मंथन करने की सलाह दी। इसके बाद से देवता और दैत्य मिलकर समुद्र मंथन करने लगे। समुद्र मंथन में मंदरांचल पर्वत मथनी बनाया गया और वासुकिनाग को नेती, जबकि कच्छप अवतार लेकर भगवान विष्णु स्वयं मंदरांचल पर्वत का आधार बन गए। जिसके बाद समुद्र मंथन का कार्य प्रारंभ हुआ।

समुद्र मंथन में देवताओं ने वासुकिनाग की पूंछ पकड़ी थी और दैत्यों ने मुंह ( वासुकिनाग मुंह से ज्वाला निकल रही थी ) इससे देवताओं में शक्ति का संचार हो रहा था और दैत्यों की शक्ति धीरे धीरे क्षीर्ण हो रही थी।

इस समुद्र मंथन में कुल 14 रत्न निकले सबसे पहले विष निकला जिसे भगवान शंकर ने पिया उसके बाद कुछ अन्य चीजें निकली उसके बाद अंत में धनवंतरी अमृत का कलश लेकर आए, धन्वंतरि के हाथ में अमृत देख दैत्य उसे लेने के लिए दौड़े, ये देखकर धन्वंतरि वहां से भागे और देवताओं और असुरों के बीच अमृत को लेकर युद्ध शुरू हो गया।

कहा जाता है कि इस युद्ध में अमृत की बूंदें चार जगहों प्रयागराज (इलाहाबाद) में गंगा ,यमुना,सरस्वती के संगम पर, नासिक में गोदावरी नदी , उज्जैन में शिप्रा नदी और हरिद्वार में गंगा नदी में गिरी। इसी कारण इन्हीं चार जगहों पर कुंभ मेला लगता है।

मान्यता के अनुसार देवताओं और दैत्यों के बीच यह युद्ध 12 दिनों तक चला देवताओं के 12 दिन धरती के 12 वर्षों के बराबर माने जाते हैं। इसी कारण हर 12 वर्ष बाद कुंभ का मेला लगता है, वही माना जाता है कि जिस प्रकार घड़ी में हर 12 घंटे बाद पुराना समय आता है उसी तरह हर 12 वर्ष बाद भी नदियों का जल अमृत लेकर आता है।

कुंभ मेला हरिद्वार 2021 के मुख्य स्नान
कुंभ मेले में 6 दिन मुख्य स्नान का खासा महत्व है
पहला स्नान तो 14 जनवरी 2021 को हो गया है –
अन्य मुख्य स्नान इस प्रकार हैं...
11 फरवरी 2021 मौनी अमावस्या के दिन
16 फरवरी 2021 बसंत पंचमी के दिन
27 फरवरी 2021 माघ पूर्णिमा के दिन
13 अप्रैल 2021 चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को
24 अप्रैल 2021 रामनवमी को

हरिद्वार कुंभ मेले में : उत्तराखंड की लोक संस्कृति की झलक...
इस बार कुंभ के अवसर पर मायानगरी को दुल्हन की तरह सजाया गया है। यहां दीवारों पर इस वर्ष उत्तराखंड की लोक संस्कृति की झलक भी देखने को मिलेगी। जिसमें कुमाऊं के रीति रिवाज और सांस्कृतिक नृत्य छोलिया नृत्य के भी चित्र उकेरे गए हैं, माना जा रहा है कि इससे उत्तराखंड की लोक संस्कृति को भी एक अलग पहचान मिलेगी।



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