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होली अजब गजब : ब्रज में टेसू के फूलों से तो बरसाना में लट्ठ और लड्डू की होली...

आज होलिका दहन तो कल रंगों का त्यौहार होली है। दरअसल देश के हर हिस्से में होली मनाई जाती है, वृंदावन-मथुरा के केंद्र में स्थित ब्रज में राधा-कृष्ण की पवित्र भूमि में सबसे अनूठा उत्सव मनाया जाता है। ऐसे में हम आपको ब्रज की भूमि में खेली जाने वाली कुछ अजब गजब होली के बारे में बता रहे है। जो अपनी अनूठी परम्पराओं के चलते विश्व भर में प्रसिद्ध है।

यह होली चूंकि ब्रज भूमि के गांव में मनाईं जाती हैं, इसलिए त्यौहार को ब्रज की होली भी कहा जाता है। यहां, उत्सव अक्सर बसंत पंचमी से शुरू होते हैं और होली के अंतिम दिन से 2-3 दिन बाद तक चलते हैं! कुल मिलाकर होली को लेकर ब्रज की अपनी कुछ खास परम्पराएं हैं।

ब्रज की प्रमुख होली में अलीगढ़ की टेसू के फूलों की होली, लड्डू की होली- बरसाना,रंगीली गली में लठमार होली- बरसाना, फूलों की होली और रंगबर्नी होली,विधवाओं के लिए गुलाल की होली- वृंदावन,होलिका दहन- बांके बिहारी मंदिर, नंदगांव का हुरंगा- दाऊजी मंदिर खास हैं।

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ब्रज की होली का आकर्षण देश ही नहीं दुनिया में देखने को मिलता है। ब्रज की होली की यह ख्याति सदियों से है। स्वर्ग बैकुंठ में होरी जो नांहि, तो कहा करैं लै कोरी ठकुराई...किशनगढ़ रियासत के महाराज नागरीदास का यह पद ब्रज की होली के इस प्राचीन वैभव को दर्शाता है।

दरअसल आज भी अलीगढ़ में टेसू के फूलों से होली खेले जाने की पंरपरा कायम है। 100 वर्षों से भी ज्यादा समय से चली आ रही होलिका दहन से पूर्व की यह प्रथा आज भी कायम है। पूरा अलीगढ़ इस दिन बसंती रंग में रंगी नजर आती है। होली के रंगों में चोबा, अगरू, अरगजा, कुमकुमा और टेसू का नाम कम ही लोगों ने सुना होगा। दरअसल यह वो प्राकृतिक रंग हैं, जिनसे ब्रज की होली की खुश्बू जमीन से आसमान तक महकती है।

वैसे तो बसंत पंचमी से ही ब्रजक्षेत्र में आने वाले अलीगढ़ के मंदिरों में भी होली शुरू हो जाती है। ठाकुर जी की पोशाक, श्रृंगार से लेकर भोग तक में इसकी झलक दिखती है। इसमें ब्रज की प्राचीन पारंपरिक होली से जुड़ा परिदृश्य देखने को मिलता है। भले ही अब होली के परिदृष्य में प्राकृतिक रंग सिर्फ गायन तक ही सिमट कर रह गए हैं।

बदलते समय में अब सिर्फ कुछ मंदिरों में टेसू के फूलों का रंग भले ही इस परंपरा को निभाए हुए हैं। वहीं अलीगढ़ के बाजार टेसू के फूलों से होने वाली ब्रज की इस परंपरा को आज भी कायम रखे हुए है। यहां इसे छोटी होली के नाम से भी पहचाना जाता है। होलिका दहन से पूर्व पुराने शहर के बाजारों में बड़े-बड़े ड्रमों में टेसू के फूलों से तैयार होने वाले रंग से होली खेली जाती है।

बरसाना की लड्डू व लठमार होली...
वहीं दूसरी ओर बरसाना में लड्डू की होली व लठमार होली बहुत प्रसिद्ध है। लड्डू की होली, ब्रज की होली का पहला दिन है। यह राधा रानी के गांव बरसाना में आयोजित होता है। लड्डू मार होली में मंदिरों में भक्तों का जमावड़ा होता है, नाचते हैं, गाते हैं और बाद में एक दूसरे पर लड्डू फेंकते हैं, जिसे अंततः प्रसाद के रूप में खाया जाता है।

जबकि वहीं बरसाना की ही रंगीली गली में लठमार होली के दिन, बरसाना की महिलाएं लाठी या लाठियां लेती हैं और क्षेत्र से दूर पुरुषों का पीछा करती हैं। यह प्रथा भगवान कृष्ण की कहानी से आती है, जो एक बार राधा के गांव में उनसे और उनके दोस्तों को चिढ़ाने के लिए गए थे।

उस समय, गांव की गोपियों ने इसे अपराध माना और लाठी से उनका पीछा किया। राधा के गांव बरसाना में समारोहों के बाद अगले दिन नंदगांव में लठमार होली मनाई जाती है।

इसके अतिरिक्त मथुरा में भगवान कृष्ण की जन्मभूमि, फूल की होली या फूलों की होली बांके बिहारी मंदिर में होती है। यहां राधा-कृष्ण की मूर्तियों को सुंदर और ताजा खिले हुए माला के साथ परोसा जाता है। स्थानीय पुजारी और निवासी केवल फूलों और पंखुड़ियों का उपयोग इस होली उत्सव के दौरान एक दूसरे के साथ खेलने के लिए करते हैं।

इसके अलावा दुनिया के बाकी हिस्सों की तरह, मथुरा-वृंदावन में रंग-बिरंगी होली मनाई जाएगी, जिसमें जीवंत गुलाल अक्सर फूलों के साथ बनाया जाता है।

वहीं वृंदावन में गुलाल की होली होती है। परंपरागत रूप से, विधवाओं को उनके पति के जाने के बाद सफ़ेद कपड़े पहनने के लिए कहा जाता है। हालांकि, इस दिन, वे पिछली परंपरा के नियमों को तोड़ती हैं। इस दिन, विधवाओं को एक-दूसरे को गुलाल लगाते हुए देखते हैं और एक-दूसरे को रंग और आजीविका देते हैं।

मथुरा की होली:
वृंदावन में उत्सव समाप्त होने के बाद मथुरा में उत्सव शुरू किया जाता है। मथुरा के श्री द्वारकाधीश मंदिर में कई तरह के रंग बिरंगे और सुगंधित फूलों से होली मनाई जाती है। होली के दिन द्वारकाधीश मंदिर में भव्य समारोह आयोजित किए जाते हैं। उत्सव यहां ही समाप्त नहीं होता है। होली के एक दिन बाद शहर के बाहर दाऊजी मंदिर में दर्शन किए जाते हैं।

दाऊजी मंदिर, नंदगांव का हुरंगा:
रंगीन होली के एक दिन बाद यह उत्सव मनाया जाता है। इसमें महिलाएं पुरुषों के कपड़े फाड़ देती हैं और उन्हें अपने फटे-पुराने परिधानों से पीटती हैं। यह विशेष अनुष्ठान केवल दाऊजी मंदिर के प्रांगण में होता है जो मथुरा से लगभग 30 किमी दूर स्थित है।

बांके बिहारी मंदिर: दानव होलिका को जलाने का प्रतीक...
होलिका दहन या छोटी होली को होलिका दहन के साथ मनाया जाता है जो दानव होलिका को जलाने का प्रतीक है। यह आमतौर पर रंगवाली होली से पहले शाम को किया जाता है।



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