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Chaitra Navratri 2021 - Day6 - चैत्र नवरात्रि की षष्ठी कत्यायनी माता का दिन, जानिए पूजा विधि, मंत्र, आरती, महत्व और आशीर्वाद

चैत्र नवारत्रि 2021 का आज यानि 18 अप्रैल को छठा दिन यानि षष्ठी है। इस दिन मां दुर्गा के छठे रूप देवी मां कात्यायनी का पूजन किया जाता है। इन्हें युद्ध की देवी भी कहा जाता है। वहीं इसके अलावा ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार देवी कात्यायनी बृहस्पति ग्रह ( Jupiter ) को नियंत्रित करती हैं। देवी की पूजा से बृहस्पति के बुरे प्रभाव कम होते हैं।

साथ ही यह भी मान्यता है कि जिन कुंवारी कन्याओं का विवाह ( Vivah ) नहीं हो रहा या फिर जिन विवाहिताओं के वैवाहिक जीवन में कुछ परेशानी है तो उन्हें शक्ति के इस स्वरूप की पूजा अवश्य करनी चाहिए।

गोपियों ने की थी देवी मां से आराधना...
वहीं भगवान श्रीकृष्ण ( shri-krishna ) को पति रूप में पाने के लिए ब्रज की गोपियों ने इन्हीं की पूजा की थी। यह पूजा कालिंदी यमुना ( Yamuna ) के तट पर की गई थी। श्रीमदभागवत पुराण के अनुसार ब्रज की गोपियों ने भगवान कृष्ण ( Lord krishna ) को पति रूप में पाने के लिए गोपियों ने मां कात्यायनी की पूजा की थी, जिसके फलस्वरूप उन्हें कृष्ण की पत्नी बनने का सौभाग्य मिला।

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माता कात्यायनी का स्वरूप
नौ देवियों ( Nine Goddess ) में कात्यायनी मां दुर्गा का छठा अवतार हैं। देवी का यह स्वरूप करुणामयी है। देवी पुराण के अनुसार कात्यायन ऋषि के घर उनकी पुत्री के रूप में जन्म लेने के कारण इन्हें कात्यायनी के नाम से जाना जाता है।

मां कात्यायनी ( Maa Katyayni ) का शरीर सोने जैसा सुनहरा और चमकदार है। मां 4 भुजाधारी और सिंह पर सवार हैं। उन्होंने एक हाथ में तलवार और दूसरे हस्त में कमल का पुष्प धारण किया हुआ है, जबकि दाहिने दो हाथों से वरद एवं अभय मुद्रा धारण की हुईं हैं। देवी लाल वस्त्र में सुशोभित हो रही हैं।

 

पौराणिक मान्यताएं : Devi Katyayani mythological story

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार देवी कात्यायनी ने कात्यायन ऋषि को जन्म दिया था, इसलिए उनका नाम कात्यायनी पड़ा। कई जगह यह भी संदर्भ मिलता है कि वे देवी शक्ति की अवतार ( Devi Avtar ) हैं और कात्यायन ऋषि ने सबसे पहले उनकी उपासना की, इसलिए उनका नाम कात्यायनी पड़ा।

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जब पूरी दुनिया में महिषासुर नामक राक्षस ने अपना ताण्डव मचाया था, तब देवी कात्यायनी ने उसका वध किया और ब्रह्माण्ड को उसके अत्याचार से मुक्त कराया।

तलवार आदि अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित देवी और दानव महिषासुर में घोर युद्ध हुआ। उसके बाद जैसे ही देवी उसके क़रीब गईं, उसने भैंसे का रूप धारण कर लिया। इसके बाद देवी ने अपने तलवार से उसका गर्दन धड़ से अलग कर दिया। महिषासुर का वध करने के कारण ही देवी को महिषासुर मर्दिनी ( mahishasur-mardini-strota ) कहा जाता है।

कात्यायनी माता की पूजा विधि : Devi Katyayani poojan vidhi
कात्यायनी माता की पूजा के दिन भी ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान आदि और घर की सफाई के कर्मों के बाद हाथों में फूल लेकर देवी को प्रणाम कर देवी के मंत्र का ध्यान किया जाता है।

देवी की पूजा के पश्चात महादेव ( Lord Shiv ) और परम पिता की पूजा करनी चाहिए। साथ ही श्री हरि की पूजा ( Lord Vishnu ) देवी लक्ष्मी के साथ ही करनी चाहिए। इस दिन शुद्धता का खास ध्यान रखा जाता है।

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इस समय मां की प्रतिमा को शुद्ध जल या गंगाजल (Ganga jal ) से स्नान कराने के बाद देवी मां को पीले रंग के वस्त्र व पुष्प अर्पित करें। मां को रोली कुमकुम लगाने के साथ ही देवी मां को पांच प्रकार के फल और मिष्ठान का भोग लगाएं। मां कात्यायनी को शहद का भोग अवश्य लगाएं और देवी मां ( Goddess ) का अधिक से अधिक ध्यान करें। साथ ही देवी मां की आरती भी करें।

मां का भोग : इस दिन प्रसाद में मधु यानी शहद का प्रयोग करना चाहिए।

आशीर्वाद : इनकी उपासना भक्तों को बड़ी आसानी से अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष चारों फलों की प्राप्ति होती है। उसके रोग, शोक, संताप और भय नष्ट हो जाते हैं।

वहीं कुछ जानकारों के अनुसार नवरात्रि की षष्ठी तिथि को मां कात्यायनी की पूजा गोधुलि बेला यानि शाम के समय में करना उत्तम माना गया है। मां कात्यायनी की पूजा विधि पूर्वक करने से सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है और शत्रुओं का नाश होता है। रोग से भी मुक्ति मिलती है।

मंत्र
ॐ देवी कात्यायन्यै नमः॥ (लगातार 108 बार पढ़ें)

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मंत्र - चंद्र हासोज्ज वलकरा शार्दूलवर वाहना।
कात्यायनी शुभंदद्या देवी दानव घातिनि।।

प्रार्थना मंत्र
चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना।
कात्यायनी शुभं दद्याद् देवी दानवघातिनी॥

स्तुति
या देवी सर्वभू‍तेषु मां कात्यायनी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

ध्यान मंत्र
वन्दे वाञ्छित मनोरथार्थ चन्द्रार्धकृतशेखराम्।
सिंहारूढा चतुर्भुजा कात्यायनी यशस्विनीम्॥
स्वर्णवर्णा आज्ञाचक्र स्थिताम् षष्ठम दुर्गा त्रिनेत्राम्।
वराभीत करां षगपदधरां कात्यायनसुतां भजामि॥
पटाम्बर परिधानां स्मेरमुखी नानालङ्कार भूषिताम्।
मञ्जीर, हार, केयूर, किङ्किणि, रत्नकुण्डल मण्डिताम्॥
प्रसन्नवदना पल्लवाधरां कान्त कपोलाम् तुगम् कुचाम्।
कमनीयां लावण्यां त्रिवलीविभूषित निम्न नाभिम्॥

स्त्रोत
कञ्चनाभां वराभयं पद्मधरा मुकटोज्जवलां।
स्मेरमुखी शिवपत्नी कात्यायनेसुते नमोऽस्तुते॥
पटाम्बर परिधानां नानालङ्कार भूषिताम्।
सिंहस्थिताम् पद्महस्तां कात्यायनसुते नमोऽस्तुते॥
परमानन्दमयी देवी परब्रह्म परमात्मा।
परमशक्ति, परमभक्ति, कात्यायनसुते नमोऽस्तुते॥
विश्वकर्ती, विश्वभर्ती, विश्वहर्ती, विश्वप्रीता।
विश्वाचिन्ता, विश्वातीता कात्यायनसुते नमोऽस्तुते॥
कां बीजा, कां जपानन्दकां बीज जप तोषिते।
कां कां बीज जपदासक्ताकां कां सन्तुता॥
कांकारहर्षिणीकां धनदाधनमासना।
कां बीज जपकारिणीकां बीज तप मानसा॥
कां कारिणी कां मन्त्रपूजिताकां बीज धारिणी।
कां कीं कूंकै क: ठ: छ: स्वाहारूपिणी॥

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कवच मंत्र
कात्यायनौमुख पातु कां स्वाहास्वरूपिणी।
ललाटे विजया पातु मालिनी नित्य सुन्दरी॥
कल्याणी हृदयम् पातु जया भगमालिनी॥

माता कात्यायनी की पूजा का महत्व : importance of mata Katyayani puja
हिंदू शास्त्रों के अनुसार, ऐसा माना जाता है कि भक्त देवी कात्यायनी की पूजा करते हैं क्योंकि वह साहस, ज्ञान और ताकत का प्रतीक ( Goddess temple ) है। ऐसा माना जाता है कि भक्तों को पूजा करके आंतरिक शक्ति प्राप्त होती है।

शास्त्रों और वेदों के मुताबिक, यह कहा जाता है कि शादी ( Marriage ) करने योग्य लड़कियां आम तौर पर एक अच्छा पति पाने के लिए एक महीने की अवधि के लिए कात्यायनी व्रत का पालन करती हैं। एक महीने की अवधि के दौरान, देवी कात्यायनी की नियमित रूप से फूलों, प्रार्थनाओं, अगरबत्ती और चंदन के साथ पूजा की जाती है।

हिंदू मान्यताओं के अनुसार, देवी कात्यायनी महिला भक्तों के लिए एक विशेष महत्व रखती हैं। इसलिए, तमिलनाडु के क्षेत्रों में पोंगल के समय, युवा लड़कियां समृद्धि और अच्छे भाग्य की प्राप्ति के लिए देवी कात्यायनी की पूजा करती हैं। देवी कात्यायनी की पूजा भक्तों के जीवन से सभी प्रकार की नकारात्मकता को समाप्त करती है।


माता कात्यायनी की आरती : Maa Katyayani Aarti

जय जय अंबे जय कात्यायनी ।

जय जगमाता जग की महारानी ।।

बैजनाथ स्थान तुम्हारा ।

वहां वरदाती नाम पुकारा ।।

कई नाम हैं कई धाम हैं ।

यह स्थान भी तो सुखधाम है ।।

हर मंदिर में जोत तुम्हारी ।

कहीं योगेश्वरी महिमा न्यारी ।।

हर जगह उत्सव होते रहते ।

हर मंदिर में भक्त हैं कहते ।।

कात्यायनी रक्षक काया की ।

ग्रंथि काटे मोह माया की ।।

झूठे मोह से छुड़ानेवाली ।

अपना नाम जपानेवाली ।।

बृहस्पतिवार को पूजा करियो ।

ध्यान कात्यायनी का धरियो ।।

हर संकट को दूर करेगी ।

भंडारे भरपूर करेगी ।।

जो भी मां को भक्त पुकारे ।

कात्यायनी सब कष्ट निवारे ।।

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