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Chaitra Navratri 2021 Day7 सप्तमी के दिन मां कालरात्रि की पूजा विधि, मंत्र के अलावा जानें महत्व और पौराणिक कथा

चैत्र नवरात्रि 2021 ( Chaitra Navratri ) की आज सोमवार 19 अप्रैल को सप्तमी Maha Saptami है। नवरात्रि के इस सातवें दिन मां कालरात्रि की पूजा की जाती है । मां कालरात्रि को यंत्र, मंत्र और तंत्र की देवी माना जाता है। कहा जाता है कि देवी दुर्गा ( Devi Durga ) ने रक्तबीज का वध करने के लिए कालरात्रि को अपने तेज से उत्पन्न किया था। इनकी उपासना से प्राणी सर्वथा भय मुक्त हो जाता है।

माना जाता है कि देवी मां का ये रूप काल तक का नाश करने वाला हैं, इसलिए ये कालरात्रि कहलाता है। संसार में कालों का नाश करने वाली देवी ‘कालरात्री’ Kalaratri Puja ही है। ये भक्तों के सभी दुख, संताप को हर लेती है।

दुश्मनों का नाश करने के साथ ही माता मनोवांछित फल प्रदान कर उपासक को संतुष्ट करती हैं। कहा जाता है कि मां कालरात्रि भक्तों की ग्रह बाधाओं को दूर करने के साथ ही उनके अग्नि, जल, जंतु, शत्रु और रात्रि भय को भी दूर कर देती हैं। इनकी कृपा से भक्त हर तरह के भय से मुक्त हो जाता है।

शनि ग्रह की नियंत्रक...
ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार देवी कालरात्रि शनि ग्रह ( Saturn ) को नियंत्रित करती हैं। देवी की पूजा से शनि के बुरे प्रभाव कम होते हैं।

मां का स्वरूप:

इनके शरीर का रंग काला है। मां कालरात्रि ( Hindu Goddess ) के गले में नरमुंड की माला है। कालरात्रि ( Kalaratri ) के तीन नेत्र हैं और उनके केश खुले हुए हैं। मां गर्दभ की सवारी करती हैं। मां के चार हाथ हैं एक हाथ में कटार और एक हाथ में लोहे का कांटा है।

मंत्र:
ॐ जयंती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी।
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोस्तु ते।।
जय त्वं देवि चामुण्डे जय भूतार्तिहारिणि।
जय सर्वगते देवि कालरात्रि नमोस्तु ते।।

- धां धीं धूं धूर्जटे: पत्नी वां वीं वूं वागधीश्वरी
क्रां क्रीं क्रूं कालिका देवि शां शीं शूं मे शुभं कुरु।।

बीज मंत्र : ऊं ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे। ( तीन, सात या ग्यारह माला करें)

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कालरात्रि पूजा विधि : puja vidhi

सप्तमी Maha Saptami की पूजा अन्य दिनों की तरह ही होती परंतु रात्रि में विशेष विधान के साथ देवी ( Goddess ) की पूजा की जाती है। प्रति दिन के नित्य कर्मो के बाद साफ और स्वच्छ कपड़े पहन कर कलश पूजा करनी चाहिए। इसके बाद सभी देवताओं की पूजा के बाद मां कालरात्रि ( Kalratri Ji ) की पूजा भी करनी चाहिए।

लाल चम्पा के फूलों से मां प्रसन्न होती हैं। दूध , खीर या अन्य मीठे प्रसाद का भोग लगाना चाहिए। लाल चन्दन , केसर , कुमकुम आदि से मां को तिलक लगाएं। अक्षत चढ़ाएं और मां के सामने सुगंधित धूप और अगरबत्ती आदि भी लगाए।

इस दिन कहीं कहीं तांत्रिक विधि से पूजा होने पर मदिरा भी देवी को अर्पित कि जाती है। सप्तमी की रात्रि ‘सिद्धियों’ की रात भी कही जाती है। पूजा विधान ( Puja Path ) में शास्त्रों में जैसा वर्णित हैं उसके अनुसार पहले कलश की पूजा करनी चाहिए। नवग्रह, दशदिक्पाल, देवी के परिवार में उपस्थित देवी देवता की पूजा करनी चाहिए फिर मां कालरात्रि ( Maa Durga Seventh Avatar ) की पूजा करनी चाहिए। देवी की पूजा से पहले उनका ध्यान करना चाहिए।

'' देव्या यया ततमिदं जगदात्मशक्तया, निश्शेषदेवगणशक्तिसमूहमूत्र्या तामम्बिकामखिलदेवमहर्षिपूज्यां, भक्त नता: स्म विदाधातु शुभानि सा न:...

दुर्गा पूजा ( Durga Saptshati ) में सप्तमी तिथि का काफी महत्व बताया गया है। इस दिन से भक्त जनों के लिए देवी मां का दरवाज़ा खुल जाता है और भक्त पूजा स्थलों पर देवी के दर्शन के लिए पूजा स्थल पर जुटने लगते हैं। ध्यान रहे देवी की पूजा के बाद शिव और ब्रह्मा जी की पूजा भी अवश्य करनी चाहिए।

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स्तुति
या देवी सर्वभूतेषु माँ कालरात्रि रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

प्रार्थना मंत्र
एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता।
लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्त शरीरिणी॥
वामपादोल्लसल्लोह लताकण्टकभूषणा।
वर्धन मूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयङ्करी॥

ध्यान मंत्र
करालवन्दना घोरां मुक्तकेशी चतुर्भुजाम्।
कालरात्रिम् करालिंका दिव्याम् विद्युतमाला विभूषिताम्॥
दिव्यम् लौहवज्र खड्ग वामोघोर्ध्व कराम्बुजाम्।
अभयम् वरदाम् चैव दक्षिणोध्वाघः पार्णिकाम् मम्॥
महामेघ प्रभाम् श्यामाम् तक्षा चैव गर्दभारूढ़ा।
घोरदंश कारालास्यां पीनोन्नत पयोधराम्॥
सुख पप्रसन्न वदना स्मेरान्न सरोरूहाम्।
एवम् सचियन्तयेत् कालरात्रिम् सर्वकाम् समृध्दिदाम्॥

कवच मंत्र
ऊँ क्लीं मे हृदयम् पातु पादौ श्रीकालरात्रि।
ललाटे सततम् पातु तुष्टग्रह निवारिणी॥
रसनाम् पातु कौमारी, भैरवी चक्षुषोर्भम।
कटौ पृष्ठे महेशानी, कर्णोशङ्करभामिनी॥
वर्जितानी तु स्थानाभि यानि च कवचेन हि।
तानि सर्वाणि मे देवीसततंपातु स्तम्भिनी॥

आशीर्वाद / मनोकामना: मां की इस तरह की पूजा से मृत्यु का भय नहीं सताता। देवी Goddess का यह रूप ऋद्धि- सिद्धि प्रदान करने वाला है। देवी भगवती ( devi bhagwati ) के प्रताप से सब मंगल ही मंगल होता है।

कालरात्रि KalaRatri ग्रह-बाधाओं को भी दूर करने वाली हैं अतः इनके उपासकों को अग्नि-भय , जल-भय , जंतु-भय , शत्रु-भय , रात्रि-भय आदि कभी नहीं होते। इनकी कृपा से वह सर्वथा भय-मुक्त हो जाता है। इस दिन मां के पूजन से भूत प्रेत बाधा आदि भय मन से दूर होते हैं।

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शत्रुबाधा से मुक्ति :
दुश्मनों से जब आप घिर जायें और हर ओर विरोधी नजऱ आयें, तो ऐसे में आपको माता कालरात्रि ( Hindu Goddess ) की पूजा करनी चाहिए। मान्यता है कि ऐसा करने से हर तरह की शत्रुबाधा से मुक्ति मिल जाती है।

मां कालरात्रि का शत्रुबाधा मुक्ति मंत्र:
त्रैलोक्यमेतदखिलं रिपुनाशनेन त्रातं समरमुर्धनि तेस्पि हत्वा।
नीता दिवं रिपुगणा भयमप्यपास्त मस्माकमुन्मद सुरारिभवम् नमस्ते।।

भोग :
मां कालरात्रि को शहद का भोग लगाएं।

महाकाली की शक्तिपीठ
देव भूमि उत्तरांचल में टनकपुर के पास ही एक मंदिर है मां पुर्णागिरी देवी ( Purnagiri devi ) का धाम, इसे महाकाली की शक्ति पीठ में माना जाता है। मान्यता है कि यहां मां सती ( devi sati ) की नाभी गिरी थी।
यहां एक नाभी कुंड भी है, जिसके संबंध में मान्यता है कि यहां कुछ भी चढ़ाओं तो वह नाभी कुंड से होता सीधे नीचे बह रही काली नदी में पहुंच जाता है।

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माता कालरात्रि की पौराणिक मान्यताएं : mythological story
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार शुंभ और निशुंभ नामक दो दानव थे जिन्होंने देवलोक ( devlok ) में तबाही मचा रखी थी। इस युद्ध में देवताओं के राजा इंद्रदेव की हार हो गई और देवलोक पर दानवों का राज हो गया।

तब सभी देव अपने लोक को वापस पाने के लिए मां पार्वती ( Maa Parvati ) के पास गए। जिस समय देवताओं ने देवी को अपनी व्यथा सुनाई उस समय देवी अपने घर में स्नान कर रहीं थीं, इसलिए उन्होंने उनकी मदद के लिए चण्डी को भेजा।

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जब देवी( Goddess ) चण्डी दानवों से युद्ध के लिए गईं तो दानवों ने उनसे लड़ने के लिए चण्ड-मुण्ड को भेजा। तब देवी ने मां कालरात्रि Maha Saptami and Kalaratri Puja को उत्पन्न किया। तब देवी ने उनका वध किया जिसके कारण उनका नाम चामुण्डा पड़ा। इसके बाद उनसे लड़ने के लिए रक्तबीज नामक राक्षस आया।

वह अपने शरीर को विशालकाय बनाने में सक्षम था और उसके रक्त (खून) के गिरने से भी एक नया दानव (रक्तबीज) पैदा हो रहा था। तब देवी ने उसे मारकर उसका रक्त पीने का विचार किया, ताकि न उसका खून ज़मीन पर गिरे और न ही कोई दूसरा पैदा हो।

माता कालरात्रि Kalaratri Puja को लेकर बहुत सारे संदर्भ मिलते हैं। आइए हम उनमें से एक बताते हैं कि देवी पार्वती दुर्गा में कैसे परिवर्तित हुईं? मान्यताओं के मुताबिक़ दुर्गासुर नामक राक्षस शिव-पार्वती के निवास स्थान कैलाश पर्वत पर देवी पार्वती की अनुपस्थिति में हमला करने की लगातार कोशिश कर रहा था।

इसलिए देवी पार्वती Devi Parvati ने उससे निपटने के लिए कालरात्रि को भेजा, लेकिन वह लगातार विशालकाय होता जा रहा था। तब देवी ने अपने आप को भी और शक्तिशाली बनाया और शस्त्रों से सुसज्जित हुईं। उसके बाद जैसे ही दुर्गासुर ने दोबारा कैलाश पर हमला करने की कोशिश की, देवी ने उसको मार गिराया। इसी कारण उन्हें दुर्गा कहा गया।

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हर रोज यहां आराम करतीं हैं महाकाली!
देवभूमि उत्तरांचल के ही पिथौरागढ़ के गंगोलीहाट की सौन्दर्य से परिपूर्ण छटाओं के बीच यहां से लगभग 1 किमी दूरी पर स्थित अत्यन्त ही प्राचीन मां भगवती महाकाली का अद्भुत मंदिर है, जो धार्मिक दृष्टि और पौराणिक दृष्टि काफी महत्वपूर्ण है व आगन्तुकों का मन मोहने में सक्षम है। स्कंदपुराण के मानस खंड में यहां स्थिति देवी का विस्तार से वर्णन मिलता है।

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ये देवी भारतीय सेना Indian Army की आराध्य देवी भी मानी जाती हैं। मान्यता है कि इस मंदिर में आज भी मां काली का वास है। दरअसल महाविद्याओंकी जननी हाटकाली Haatkali की महाआरती के बाद शक्ति के पास महाकाली का बिस्तर लगाया जाता है और सुबह बिस्तर यह दर्शाता है कि मानों यहां साक्षात् कालिका विश्राम करके गयी हों, क्योंकि विस्तर में सलवटें पडी रहती हैं।

इसके अलावा यहां के संबंध में मान्यता है कि यहां स्थित एक देवदार के पेड़ पर चढ़कर महाकाली Maha Kali Puja स्वयं भगवान विष्णु व भगवान महादेव को आवाज लगाती थीं।



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