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Gangaur 2021: शिव-पार्वती की उपासना से जुड़ा गणगौर व्रत आज, जानिए पूजा विधि, शुभ मुहूर्त और कथा

नई दिल्ली। हिंदू पंचांग के मुताबिक, चैत्र शुक्ल तृतीया को गणगौर ( Gangaur 2021 ) व्रत रखा जाता है। इस साल यह व्रत गुरुवार यानी 15 अप्रैल को है। देश के कई राज्यों में ये पर्व मनाया जाता है। इनमें राजस्थान, मध्य प्रदेश, हरियाणा और गुजरात में गणगौर मनाया जाता है। हालांकि सबसे ज्यादा राजस्थान में इस पर्व को सेलिब्रेट किया जाता है।

गणगौर व्रत में माता पार्वती और भगवान शिव की विधि-विधान से पूजा की जाती है। मान्यता है कि गणगौर व्रत रखने से सुहागिनों को अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है।

गणगौर व्रत को महिलाएं अपने पति से छिपकर रखती हैं। महिलाएं गणगौर माता यानी माता पार्वती की पूजा करके अपने पति की लंबी उम्र के लिए कामना करती हैं। आइए जानते हैं गणगौर पूजा की विधि और शुभ मुहूर्त।

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गणगौर पूजा के लिए जरूरी सामग्री
गणगौर व्रत रखने वाली महिलाएं पूजन से पहले कुछ आवश्यक सामग्री एकत्र कर लें। इसमें साफ पटरा, कलश, काली मिट्टी, होलिका की राख, गोबर या फिर मिट्टी के उपले, सुहाग की चीजें (मेहँदी, बिंदी, सिन्दूर, काजल, इत्र) प्रमुख रूप से शामिल करें।

इसके साथ ही शुद्ध घी, दीपक, गमले, कुमकुम, अक्षत, ताजे फूल, आम की पत्ती, नारियल, सुपारी, पानी से भरा हुआ कलश, गणगौर के कपड़े, गेंहू, बांस की टोकरी, चुनरी, हलवा, कौड़ी, सिक्के, घेवर, चांदी की अंगुठी, पूड़ी आदि चीजें भी साथ रखें।

पूजन की विधि
कृष्ण पक्ष की एकादशी को गणगौर व्रत के पूजन के लिए शुभ माना गया है। ऐसे में सुबह स्नान आदि करने के बाद लकड़ी की बनी टोकरी में जवारे बोना चाहिए। आइए जानते हैं क्या है पूजन विधि- सुहागिन महिलाएं दोपहर तक व्रत रखती हैं। पूजा के समय शिव-गौरी को सुंदर वस्त्र पहनाएं।

माता पार्वती को सम्पूर्ण सुहाग की वस्तुएं चढ़ाएं। चन्दन, अक्षत, धूप, दीप, दूब व पुष्प का इस्तेमाल करते हुए पूजा-अर्चना करें। इस दिन गणगौर माता को फल, पूड़ी, गेहूं चढ़ाएं हैं।

एक बड़ी सी थाली लेकर उसमें चांदी का छल्ला और सुपारी रखें। फिर जल, दूध, दही, हल्दी, कुमकुम घोलकर सुहागजल तैयार कर लें।

दोनों हाथों में दूब लेकर इस जल से पहले गणगौर पर छीटें लगाएं फिर महिलाएं उस जल को अपने ऊपर सुहाग के प्रतीक के तौर पर छिड़क लें। अंत में माता को भोग लगाकर गणगौर माता की कथा सुनें।

पुरुषों को ना दें प्रसाद
गणगौर पर चढ़ाया हुआ प्रसाद पुरुषों को नहीं दिया जाता है। जो सिन्दूर इस दिन माता पार्वती को चढ़ाया जाता है, उसे महिलाएं अपनी मांग में भरती हैं। इसे सिंदूर की डिबिया में मिलाकर पूरे वर्ष लगाया जा सकता है।

गणगौर पूजा के खास मुहूर्त
- चैत्र शुक्ल पक्ष तृतीया तिथि आरंभ- 14 अप्रैल दोपहर 12 बजकर 47 मिनट से।
- चैत्र शुक्ल पक्ष तृतीया तिथि समाप्त- 15 अप्रैल शाम 03 बजकर 27 मिनट तक।
- गणगौर पूजा शुभ मुहूर्त- 15 अप्रैल को सुबह 05 बजकर 17 मिनट से 06 बजकर 52 मिनट तक । हालांकि दोपहर तक पूजा की जा सकती है।

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ये है गणगौर व्रत कथा
एक बार भगवान शिव और माता पार्वती वन में गए। माता पार्वती ने भगवान शिव से कहा कि हे भगवान मुझे प्यास लगी है। इस पर भगवान शिव ने कहा कि देवी देखों उस ओर पक्षी उड़ रहे हैं उस स्थान पर अवश्य ही जल मौजूद होगा।

वहां एक नदी बह रही थी, माता पार्वती पानी की अंजलि भरी तो उनके हाथ में दूब का गुच्छा आ गया। जब उन्होंने दूसरी बार अंजलि भरी तो टेसू के फूल उनके हाथ में आ गए। और तीसरी बार अंजलि भरने पर ढोकला नामक फल हाथ में आ गया।

माता पार्वती के मन में कई तरह के विचार उठने लगे। शिव ने उन्हें बताया कि आज चैत्र शुक्ल तीज है। विवाहित महिलाएं इस दिन अपने सुहाग के लिए गौरी उत्सव करती हैं। गौरी को चढ़ाएं गए दूब, फूल और अन्य सामग्री नदी में बहकर आ रहे थे।

पार्वती ने शिव से विनती की, हे स्वामी दो दिन के लिए आप मेरे माता-पिता का नगर बनवा दें। जिससे सारी स्त्रियां वहीं आकर गणगौर के व्रत को करें। मैं खुद उनके सुहाग की रक्षा का आशीर्वाद दूं।

महादेव ने ऐसा ही किया। थोड़ी देर में ही बहुत सी स्त्रियों का एक दल आया। पार्वती ने महादेव से कहा- मैं तो पहले ही उन्हें वरदान दे चुकी हूं। अब आप अपनी ओर से सौभाग्य का वरदान दें।

शिव ने उन सभी स्त्रियों को सौभाग्यवती रहने का वरदान दिया। शिव- पार्वती ने जैसे उन स्त्रियों की मनोकामना पूरी की, वैसे ही भगवान शिव और गौरी माता इस कथा को पढ़ने और सुनने वाली कन्याओं और महिलाओं की मनोकामना पूर्ण करें।



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