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Akshaya Tritiya 2021 : इस दिन हुआ था भगवान परशुराम का जन्म, जानें इस बार आखातीज पर बनने वाले खास योग और शुभ मुहूर्त

हिंदू कलैंडर में वैशाख शुक्ल तृतीया को अक्षय तृतीया या आखातीज भी कहा जाता है। साथ ही इस तिथि को एक अबूझ मुहूर्त भी माना गया है। वहीं इस दिन इसी दिन Bhagwan Parshuram का जन्म हुआ था। अतः इसे परशुराम तीज भी कहतें हैं। जिसके चलते इस दिन परशुराम जन्मोत्सव भी देश में मनाया जाता है।

दरअसल यह दिन बहुत पवित्र माना गया है। इस दिन से सतयुग और त्रेतयुग का आरंभ माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन किया गया जप, तप,ज्ञान, स्नान, दान, होम आदि अक्षय रहते हैं। इसी कारण इस तिथि को Akshaya Tritiya कहते हैं।

वही यदि यह व्रत सोमवार और Rohini नक्षत्र में आए तो महाफलदायी माना जाता है। वहीं यदि तृतीया मध्याह्न से पूर्व शुरु होकर प्रदोषकाल तक रहती है तो यह अत्यंत श्रेष्ठ मानी जाती है। ऐसे में इस बार ये अक्षय तृतीया पर्व शुक्रवार, 14 मई को पड़ रहा है।

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अक्षय तृतीया 2021 : शुभ मुहूर्त...
तृतीया तिथि का प्रारंभ (14 मई 2021) : सुबह 05:38 बजे से
तृतीया तिथि का समापन (15 मई 2021) : सुबह 07:59 बजे तक

पूजा मुहूर्त...
अक्षय तृतीया पूजा मुहूर्त (14 मई 2021):05:39:23 से 12:17:45 तक
अवधि :6 घंटे 38 मिनट

इस बार बन रहे बेहद शुभ योग
अक्षय तृतीया पर धन-धान्य की देवी Goddess Lakshmi की पूजन करने का विधान है। वहीं इस बार अक्षय तृतीया Friday यानि सप्ताह का वह दिन जिसकी कारक देवी स्वयं माता लक्ष्मी होती हैं, को पड़ रही है। माता लक्ष्मी का दिन होने के चलते इस बार की अक्षय तृतीया विशेष मानी जा रही है।

इसके अलावा इस बार अक्षय तृतीया पर चंद्रमा व शुक्र दोनों ही वृषभ राशि में रहेंगे। जिसके कारण अक्षय तृतीया 2021 पर लक्ष्मी योग बन रहा है। यह योग को समृद्धि देने वाला माना जाता है। वहीं आचार्य पीपी तिवारी के अनुसार इस बार लक्ष्मी नारायण योग और Gajkesari-Yog भी बन रहा है।

लक्ष्मी नारायण योग : रात 09:26 बजे से 10:45 बजे तक
गजकेसरी योग : दोपहर 12 बजे से 01:45 बजे तक

इसके साथ ही अक्षय तृतीया 2021 पर सुकर्मा और धृति योग का निर्माण भी हो रहा है, वहीं इस दिन रोहिणी नक्षत्र रहेगा। ये दोनों ही शुभ योग हैं। पंडित एसके पांडे के अनुसार इस बार अक्षय तृतीया के दिन सुकर्मा योग 14 मई रात 12 बजकर 15 मिनट से 01 बजकर 46 मिनट तक रहेगा और ठीक इसके बाद से धृति योग आरंभ हो जाएगा।

सुकर्मा योग को शुभ फल प्रदान करने वाला योग माना जाता है। इस YOG में कोई भी नया कार्य जैसे नौकरी या फिर धार्मिक कार्य करने पर उसके शुभ फल प्राप्त होते हैं और कार्य में कोई बाधा नहीं आती है। इसे भगवान का स्मरण और पूजन करने और सत्कर्म करने के लिए सुकर्मा योग बहुत ही उत्तम माना जाता है।

वहीं धृति योग इसका अर्थ धैर्य माना गया है। माना जाता है कि इस योग में किए गए कार्यों का भी शुभ फल प्राप्त होता है लेकिन कार्य पूर्ण होने के लिए थोड़ा सा धैर्य रखना पड़ता है। मकान-जमीन आदि का नींव पूजन, शिलान्यास, भूमि पूजन आदि के लिए यह योग बहुत अच्छा माना जाता है। इस योग में रखी गई नींव के घर में रहने वालों को सभी सुख सुविधाओं की प्राप्ति होती है और जीवन खुशहाल रहता है।

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अक्षय तृतीया के संबंध में माना जाता है कि इस दिन जो भी शुभ कार्य किए जाते हैं उनका बड़ा श्रेष्ठ फल मिलता है। वहीं कई शुभ व पूजनीय काय इसी दिन होते हैं। इस दिन गंगा स्नान का बड़ा भारी माहात्म्य है। जो मनुष्य इस दिन Ganga स्नान करता है, वह निश्चय ही सारे पापों से मुक्त हो जाता है।

इस दिन स्वर्गीय आत्माओं को प्रसन्नता के लिए घड़ी, कलश,पंखा, छाता, चावल, दाल, नमक, घी, चीनी,साग, इमली, फल, वस्त्र, खड़ाऊं, सत्तू, ककड़ी, खरबूजा और दक्षिणा आदि का ब्राहमणों को दान करना चाहिए।

इसी दिन चारों धामों में प्रमुख श्री बद्रीनारायणजी के पट खुलते हैं। इस दिन भक्तजन श्री Badrinarayan जी का चित्र सिंहासन पर रख उन्हें मिश्री तथा भीगी हुई चने की दाल का भोग लगाते हैं। इस दिन भगवान को तुलसीदल चढ़ाकर श्रद्धा और भक्तिपूर्वक पूजा करके आरती करनी चाहिए।

इस दिन तिल सहित कुशों के जल से पितरों को जल दान करने से पित्तीश्वरों की अनंतकाल तक तृप्ति होती है। इस दिन जगह-जगह शीतल जल या मीठे शर्बत की प्याऊ भी लगाई जाती है। यह पर्व दान प्रधान है। इसके आसपास पड़ने वाली Mesh Sankranti में ब्राह्मणों को चीनी या गुड़ के साथ सत्तू दान करना चाहिए तथा इस दिन सत्तू अवश्य खाना चाहिए।

इसी दिन भगवान परशुराम का जन्म हुआ था। अतः इसे परशुराम तीज भी कहतें हैं। नर-Narayan ने भी इसी दिन अवतार लिया था। इसी दिन गौरीव्रत की समाप्ति के लिए गौर माता का पूजन भी किया जाता है। वृन्दावन के श्रीबांकेबिहारी जी के मंदिर में केवल इसी दिन चरण दर्शन होते हैं, अन्यथा पूरे वर्ष वस्त्रों से ढ़ंके रहते हैं।


कथा : Katha
एक बार महाराज युधिष्ठिर ने Shri krishna जी से पूछा-'हे भगवन!मुझे अक्षय तृतीया के विषय में जानने की उत्कंठा है, अतः कृपा करके अक्षय तृतीया के महात्म्य का वर्णन कीजिए। तब भगवान श्री कृष्ण बोले-'राजन!यह परम पुण्यमयी तिथि है। इस दिन दोपहर से पूर्व स्नान, जप, तप, होम, स्वाध्याय, पित्र-तर्पण और दानादि करने वाला महाभाग अक्षय पुण्य फल का भागी होता है। इसी दिन से सतयुग या धर्मयुग का आरम्भ होता है। इसलिए इसे युगादि तृतीया भी कहतें हैं।

हे युधिष्ठिर! प्राचीन काल में महादेव नामक एक बहुत निर्धन, आस्तिक, सदाचारी, गौ, देव-ब्राह्मण पूजक एक वैश्य था। उसका परिवार बहुत बड़ा था जिसके कारण वह सदैव व्याकुल रहता था। उसने किसी पंडित से अक्षय तृतीया का महात्म्य सुना कि बैशाख शुक्ल पक्ष तृतीया के दिन किए हुए दान, जप, हवन आदि से अक्षय पुण्य प्राप्त होता है।

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तब कालान्तर में जब यह पर्व आया तो उसने प्रातःकाल गंगा स्नान तथा पितरों का तर्पण किया तथा विधि पूर्वक देवताओं का पूजन किया। फिर उसने गोले के लड्डू, जौ, गेहूं, नमक, जल से भरे घड़े, सत्तू, दही, चावल, गुड़, स्वर्ण वस्त्र, कलश, पंखा, ईख से बने पदार्थ आदि दिव्य वस्तुओं का दान दिया।

सत्री के बार-बार मना करने और कुटुम्बजनों से चिंतित रहने व बुढ़ापे के कारण अनेक रोगों से पीड़ित होने पर भी वह अपने धर्म-कर्म और दान पुण्य से विमुख नहीं हुआ। इसके प्रभाव से वह वैश्य आगे चलकर कुशावती नगरी का महाप्रतापी राजा हुआ।

अक्षय तृतीया के दान के प्रभाव से वह बहुत धनी व प्रतापी बना। वैभव संपन्न होने पर भी उसकी बुद्धि कभी विचलित नहीं हुई। यह सब अक्षय तृतीया का ही पुण्य प्रभाव था। इस राजा के कोष में अक्षय संपत्ति का निवास था, अपनी इस अक्षय संपत्ति को देखकर राजा को आश्चर्य हुआ। उसने पंडितों से इसका कारण पूछा, तो राजपंडितों ने जब उसे अक्षय तृतीया का माहात्म्य बताया तब उसे अपने पूर्व पुण्य की स्मृति हो आई।

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इस दिन मंगल ऋषि का उपाख्यान भी सुनना चाहिए। कहते हैं कि जब महाराज युधिष्ठिर ने राजसूर्य यज्ञ किया तब यज्ञ की समाप्ति पर एक नेवला उस यज्ञ मंडप में ही लोटने लगा।

युधिष्ठिर इस नेवले को ऐसा करता देख पूडने लगे तो ऋषियों ने कहा- हे राजन! आप इस नकुल से ही पूछो। पूछने पर वह कहने लगा, 'युधिष्ठिर! तेरा यह यज्ञ उस ब्राह्मण के यज्ञ के बराबर भी नहीं है, जिसने तीन मुट्ठी सत्तू दान पर परम पुरुषार्थमय यज्ञ किया था।'

नेवला बोला- प्राचीन समय में खेतों से अन्न कण चुनकर निर्वाह करने वाला मुंगल नामक एक ब्राह्मण था। एक समय उसके देश में अकाल पड़ा। उस समय भूखे रहकर ब्राह्मण ने दूर-दूर जाकर खेतों में से तीन अंजुलि अन्न इक्टठा किया और परिवार के साथ भोजन करने बैठा। उस समय धर्म ने ब्राह्मण बन उस ब्राह्मण की परीक्षा ली।

उसने ब्राह्मण के द्वार पर जाकर अन्न और जल मांगा। ब्राह्मण ने अपना, पत्नी का और पुत्रवधु के भाग का भोजन उस अतिथि को दे दिया और धर्म की रक्षा की। इस अन्न के प्रभाव से निराहार हो ब्राह्मण के सारे परिवार की मृत्यु हो गई और वे पुष्पक विमान में बैठ स्वर्गलोक को गए।

वहां उस ब्राह्मण के अन्न दान के कुछ कण उस पृथ्वी पर गिर गए थे, मैं वहां पहुंचा और उस भूमि को पवित्र जान उसमें लोटने लगा। उस परम यज्ञ के कणों के प्रभाव से मेरा आधा अंग स्वर्णमय हो गया, अब आधा शेष स्वर्णमय करने को मैं हर यज्ञस्थल में जाता हूं और लोटता हूं।

परंतु आज तक दूसरा कोई यज्ञ न तो उस ब्राह्मण के यज्ञ के समान हुआ और न ही मेरा बाकी शरीर स्वर्णमय बना। आपके यज्ञ में भी मैं इसी इच्छा से लोट लगा रहा हूं। यह सुनकर युधिष्ठिर को भी सिर झुकाकर विचार करने के लिए मजबूर होना पड़ा।



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