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KALASHTAMI June 2021 : कालाष्टमी पर बुधवार को भगवान भैरव को प्रसन्न करने के लिए ऐसे करें पूजा

कालाष्टमी: यह सनातन धर्म के एक ऐसे देवता का दिन है, जो न केवल शनि के प्रकोप का समूल नाश करते हैं, वरन हर स्थिति में अपने भक्तों की रक्षा कर उन्हें जीत भी दिलाते है। ये हैं भगवान शिव के एक रूप जो देवी मंदिरों के सामने स्थित होकर उनकी रक्षा भी करते हैं।

दरअसल इन्हें हम भगवान भैरव या बाबा भैरव के नाम से जानते हैं। जिनके आठ रूपों को अष्ट भैरव Ashta Bhairav के नाम से भी जाना जाता है। वहीं भगवान भैरव के तीन प्रमुख रूप माने जाते हैं। इनमें भगवान भैरव के बटुक भैरव, महाकाल भैरव और स्वर्णाकर्षण भैरव प्रमुख रूप हैं। इनमें से भक्त बटुक भैरव की ही सर्वाधिक पूजा करते हैं।

ऐसे में साल 2021 के ज्येष्ठ मास में बुधवार 2 जून को कालाष्टमी पर्व पड़ रहा है। इस दिन भैरव बाबा के लिए कालाष्टमी व्रत रखा जाता है। मान्यता के अनुसार कालाष्टमी व्रत भगवान भैरव के भक्तों के लिए बहुत महत्वपूर्ण दिन होता है।

यह व्रत प्रत्येक महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन भगवान भैरव के भक्त पूरे दिन उपवास रखते है और वर्ष में सभी kalashtami के दिन उनकी पूजा करते हैं। इस बार कालाष्टमी पर्व 2 जून पड़ रहा है। इस दिन भैरव बाबा के लिए कालाष्टमी व्रत रखा जाता है।

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ज्येष्ठ, कृष्ण अष्टमी : 02 जून 2021
प्रारम्भ - 12:46 AM, जून 02
समाप्त - 01:12 AM, जून 03

शास्त्रों के अनुसार Kalastami के दिन काल भैरव के स्मरण मात्र से ही सभी प्रकार के पाप और कष्ट दूर हो जाते हैं। भैरव की पूजा व उपासना से मनोवांछित फल मिलता है। रोगों से मुक्ति मिलती है और हर कार्य सफल होता है। जानें व्रत की विधि के बारे में-

व्रत विधि (Kalastami Vrat Vidhi)
शिव भक्तों को BhairavNath की षोड्षोपचार सहित पूजा करनी चाहिए और उन्हें अर्घ्य देना चाहिए। दिन में व्रत रखकर रात्रि के समय जागरण करें व Shiva एवं Parvati की कथा एवं भजन कीर्तन करें। भैरव कथा का श्रवण और मनन करना चाहिए। मध्य रात्रि होने पर शंख, नगाड़ा, घंटा आदि बजाकर भैरव जी की आरती करनी चाहिए। भगवान भैरवनाथ का वाहन श्वान है।

अत: इस दिन प्रभु की प्रसन्नता के लिए श्वान को भोजन कराना चाहिए। हिंदू मान्यता के अनुसार इस दिन प्रात: काल पवित्र नदी या सरोवर में स्नान कर पितरों का श्राद्ध व तर्पण कर भैरव जी की पूजा व व्रत करने से समस्त विघ्न समाप्त हो जाते हैं।

भैरव जी की पूजा व भक्ति से भूत, पिशाच व काल भी दूर रहते हैं। शुद्ध मन एवं आचरण से जो भी कार्य करते हैं, उनमें सफलता प्राप्त होती है। इस दिन भैरव तंत्रोक्त, बटुक भैरव कवच, काल भैरव स्तोत्र, बटुक भैरव ब्रह्म कवच आदि का नियमित पाठ करने से अनेक समस्याओं का निदान होता है।

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भगवान भैरव के तीन प्रमुख रूप -
भगवान भैरव के बटुक भैरव, महाकाल भैरव और स्वर्णाकर्षण भैरव प्रमुख रूप हैं। इनमें से भक्त बटुक भैरव की ही सर्वाधिक पूजा करते हैं। तंत्रशास्त्र में अष्ट भैरव का उल्लेख भी मिलता है- असितांग भैरव, रूद्र भैरव, चंद्र भैरव, क्रोध भैरव, उन्मत भैरव, कपाल भैरव, भीषण भैरव और संहार भैरव।

भगवान भैरव की साधना में ध्यान का अधिक महत्व है। इसी को ध्यान में रखकर सात्विक, राजसिक व तामसिक स्वरूपों का ध्यान किया जाता है। ध्यान के बाद उपर दिए गए मंत्र का जप करने का विधान है।

शास्त्रीय संगीत में एक राग है भैरव...
शास्त्रीय संगीत में एक राग का नाम इन्हीं के नाम पर भैरव रखा गया है। कालभैरव की पूजा प्राय: पूरे देश में होती है और अलग-अलग अंचलों में अलग-अलग नामों से वह जाने-पहचाने जाते हैं।

महाराष्ट्र में खण्डोबा उन्हीं का एक रूप है और खण्डोबा की पूजा-अर्चना वहां ग्राम-ग्राम में की जाती है। दक्षिण भारत में भैरव का नाम शास्ता है। वैसे हर जगह एक भयदायी और उग्र देवता के रूप में ही उनको मान्यता मिली हुई है और उनकी अनेक प्रकार की मनौतियां भी स्थान-स्थान पर प्रचलित हैं।

भूत, प्रेत, पिशाच, पूतना, कोटरा और रेवती आदि की गणना भगवान शिव के अन्यतम गणों में की जाती है। दूसरे शब्दों में कहें तो विविध रोगों और आपत्तियों विपत्तियों के वह अधिदेवता हैं। शिव प्रलय के देवता भी हैं, अत: विपत्ति, रोग और मृत्यु के समस्त दूत और देवता उनके अपने सैनिक हैं। इन सब गणों के अधिपति या सेनानायक हैं महाभैरव।

भैरव कवच : पाठ करता है कई समस्याओं का निदान ...
तंत्र के ये जाने-माने महान देवता काशी के कोतवाल माने जाते हैं। मान्यता है कि भक्त भैरव तंत्रोक्त, बटुक भैरव कवच, काल भैरव स्तोत्र, बटुक भैरव ब्रह्म कवच आदि का नियमित पाठ करने से अपनी अनेक समस्याओं का निदान कर सकते हैं। भैरव कवच से असामायिक मृत्यु से बचा जा सकता है।

गृहस्थों के लिए काल भैरवाष्टक स्तोत्र का नियमित पाठ सर्वोत्तम है, जो अनेक बाधाओं से मुक्ति दिलाता है। भैरव की पूजा में काली उड़द और उड़द से बने मिष्‍ठान्न इमरती, दही बड़े, दूध और मेवा का भोग लगाना लाभकारी है, इससे भैरव प्रसन्न होते है। इसके अलावा सरसों का तेल, काजल सिंदूर और चमेली का तेल आदि इनके श्रृंगार हैं।

भैरव साधना और ध्यान
इनकी पूजा भारत और नेपाल में होती है। हिन्दू और जैन दोनों भैरव की पूजा करते हैं। भैरवों की संख्या 64 मानी जाती है। ये 64 भैरव भी 8 भागों में विभक्त हैं। ध्यान के बिना साधक मूक सदृश है, भैरव साधना में भी ध्यान की अपनी विशिष्ट महत्ता है।

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किसी भी देवता के ध्यान में केवल निर्विकल्प-भाव की उपासना को ही ध्यान नहीं कहा जा सकता। ध्यान का अर्थ है – उस देवी-देवता का संपूर्ण आकार एक क्षण में मानस-पटल पर प्रतिबिम्बित होना।

श्री बटुक भैरव जी के ध्यान के लिए इनके सात्विक, राजस व तामस रूपों का वर्णन अनेक शास्त्रों में मिलता है। जहां सात्विक ध्यान - अपमृत्यु का निवारक, आयु-आरोग्य व मोक्षफल की प्राप्ति कराता है, वहीं धर्म, अर्थ व काम की सिद्धि के लिए राजस ध्यान की उपादेयता है, इसी प्रकार कृत्या, भूत, ग्रहादि के द्वारा शत्रु का शमन करने वाला तामस ध्यान कहा गया है।

भैरव जी के मंदिर : Famus Temples of bhairava...
ग्रंथों में लिखा है कि गृहस्थ को सदा भैरवजी के सात्विक ध्यान को ही प्राथमिकता देनी चाहिए।

: भारत में भैरव के प्रसिद्ध मंदिर हैं जिनमें काशी का काल भैरव मंदिर सर्वप्रमुख माना जाता है। काशी विश्वनाथ मंदिर से भैरव मंदिर कोई डेढ़-दो किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।

: दूसरा नई दिल्ली के विनय मार्ग पर नेहरू पार्क में बटुक भैरव का पांडवकालीन मंदिर अत्यंत प्रसिद्ध है।

: तीसरा उज्जैन के काल भैरव की प्रसिद्धि का कारण भी ऐतिहासिक और तांत्रिक है।

: नैनीताल के समीप घोड़ाखाल का बटुकभैरव मंदिर भी अत्यंत प्रसिद्ध है। यहां गोलू देवता के नाम से भैरव की प्रसिद्धि है। इसके अलावा शक्तिपीठों और उपपीठों के पास स्थित भैरव मंदिरों का महत्व माना गया है।

: जयगढ़ के प्रसिद्ध किले में काल-भैरव का बड़ा प्राचीन मंदिर है जिसमें भूतपूर्व महाराजा जयपुर के ट्रस्ट की ओर से दैनिक पूजा-अर्चना के लिए पारंपरिक-पुजारी नियुक्त हैं।

: मध्य प्रदेश के सिवनी जिले के ग्राम अदेगाव में भी श्री काल भैरव का मंदिर है जो किले के अंदर है जिसे गढ़ी ऊपर के नाम से जाना जाता है।

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