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Ashok Vrat: पहले शारदीय नवरात्र को ऐसे करें भगवान शिव की विशेष आराधना

आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को यानि पहले शारदीय नवरात्र को भगवान शिव की विशेष आराधना के रूप में अशोक व्रत किया जाता है। इस बार यानि 2021 में यह व्रत 07 अक्टूबर को किया जाएगा।

पंडित सुनील शर्मा के अनुसार इस दिन अशोक के वृक्ष की पूजा करनी चाहिए। माना जाता है कि जो व्यक्ति इस व्रत को करते हैं, भगवान शिव उनकी सभी मनोकामनाएं पूरी करते हैं और अंत में वे शिवलोक में प्रतिष्ठा पाते हैं।

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व्रत धारण करने वाला अशोक के वृक्ष की पूजा करता है न कि किसी मूर्ति की। अशोक के वृक्ष पर जल चढ़ाने के बाद हल्दी, रोली, चावल,कलावा आदि से पूजन करके दीपक जलाते हैं व अर्घ्य देते हैं। फिर प्रसाद के रूप में घी व गुड़ चढ़ाते हैं। घर वृक्ष के तने पर चढ़ाकर कलावा बांधा जाता है और गुड़ को जड़ों के पास रख देते हैं।
बारह वर्षों तक इस प्रकार करने के बाद सोने का एक अशोक वृक्ष बनवाकर, उसका पूजन करके अपने कुलगुरु को समर्पित किया जाता है।

पूजा की विधि और इस व्रत का महात्म्य-
आश्विन शुक्ल प्रतिपदा को ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्नानादि से निवृत होने के पश्चात साफ कपड़े पहनकर, समस्त पूजन सामग्री को इक्ट्ठा कर किसी उद्यान में अशोक वृक्ष के पास लें जाएं। इसके बाद इस वृक्ष के चारों ओर सफाई कर गंगाजल से शुद्ध कर लें। इसके बाद अशोक वृक्ष को रंगीन कागज व पताकाओं से सजाएं। अब सबसे पहले वृक्ष को वस्त्र अर्पित करें।

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फिर गंध,पुष्प,धूप,दीप,तिल आदि से वृक्ष की पूजन करें और सप्तधान्य,ऋतुफल,नारियल, अनार, लड्डू सहित अनेक प्रकार के नैवेद्य अर्पित करें। अशोक वृक्ष के पूजन के पश्चात मंत्र (पितृभ्रातृपतिश्वश्रुश्वशुराणां तथैव च। अशोक शोकशमनो भव सर्वत्र न: कुले।।) से प्रार्थना करें और अर्घ्य प्रदान करें।

मंत्र का अर्थ : अशोक वृक्ष! आप मेरे कुल में पिता, भाई , पति, सास और ससुर आदि सभी का शोक नष्ट करें।

प्रार्थना के बाद अशोक-वृक्ष की प्रदक्षिणा करें। ब्राह्मण को दान दें। फिर अगले दिन सुबह पूजा करके भोजन करें।

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माना जाता है कि यदि इस व्रत को कोई स्त्री भक्ति पूर्वक करे तो वह दमयंती, स्वाहा, वेदवती और सती की भांति अपने पति की अति प्रिय हो जाती है। कहा जाता है कि वनगमन के समय सीता जी ने भी मार्ग में अशोक-वृक्ष का भक्तिपूर्वक गंध,पुष्प,धूप,दीप,नैवेद्य, तिल,अक्षत आदि से पूजन कर प्रदक्षिणा की थी, उसके बाद ही वह वन को गई।

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जो स्त्री तिल, अक्षत, गेहूं, सप्तधान्य आदि से अशोक-वृक्ष का पूजन कर, मंत्र से वंदना और प्रदक्षिणा कर ब्राह्मण को दक्षिणा देती है, वह शोकमुक्त होकर चिरकाल तक अपने पति सहित संसार के सुख का उपभोग कर अंत में गौरी लोक में निवास करती है। माना जाता है कि यह अशोक व्रत सब प्रकार के शोक व रोग को हरने वाला है।



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